आज 17 रमजान — यौम-ए-बदर}

 {आज 17 रमजान — यौम-ए-बदर}


              बदर : अत्याचार के विरुद्ध पहली लड़ाई


                           🪶 एम. आई. शेख


जिंदा रहना है तो हालात से डरना कैसा  

जंग लाज़िम हो तो लश्कर नहीं देखे जाते


▪️28 फ़रवरी को अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर हमला कर के आयतुल्ला खौमेनाई और उनके 40 मददगारों को मारने के बाद इज़राइल और फ़िलिस्तीन के बीच का युद्ध अब फुलस्केल ईरान इजरायल युद्ध में तब्दील हो गया है। पिछले वर्ष रमज़ान में भी ये बहुत तेज़ चल रहा था। रमज़ान इबादत का महीना है, और अत्याचार के विरुद्ध युद्ध करना भी इस्लाम में इबादत ही माना जाता है। बदर का युद्ध भी पैग़म्बर मुहम्मद (सल्ल.) के नेतृत्व में 3 हिजरी के 17 रमज़ान को ही लड़ा गया था। इसलिए रमज़ान के अवसर पर बदर के युद्ध के बारे में जानकारी लेना अनुचित नहीं होगा।


▪️ इस्लाम एक समतावादी धर्म है, इसलिए पृथ्वी पर जहाँ भी इसके नाम का उच्चारण होता है, वहाँ स्थापित वर्गों की ओर से इसका विरोध शुरू हो जाता है, जबकि सामान्य जनता इसकी ओर आकर्षित होती है। ग़ार-ए-हिरा में पैग़म्बरी मिलने के बाद जब हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) ने इस्लाम की घोषणा की, तो जिस मक्का शहर में उन्हें अमीन (विश्वासपात्र) और सादिक (सच्चे) के रूप में जाना जाता था, उसी शहर में उनका विरोध शुरू हो गया। यह विरोध शोषित लोगों की ओर से नहीं बल्कि स्थापित वर्गों की ओर से हुआ।


▪️ उस समय मक्का अरब का आर्थिक केंद्र था। वहाँ स्थित काबा में 360 मूर्तियाँ रखी हुई थीं। हर मूर्ति कई क़बीलों की कुलदेवी-देवता मानी जाती थी। उस दौर की क़बीलाई सामाजिक व्यवस्था में कुलदेवता का अत्यधिक महत्व था।


🪉हर क़बीले में जब भी कोई शुभ घटना होती, तो लोग मक्का आकर अपने कुलदेवता के साथ उसका उत्सव मनाते थे। वर्ष के 360 दिनों तक लगातार अलग-अलग क़बीले मक्का आते, बकरे, ऊँट और पूजा का सामान खरीदते, कुछ दिन रुकते और वापस चले जाते। इस कारण मक्का में चारों दिशाओं से धन का लगातार प्रवाह होता रहता था।


🪉 360 दिनों का यह सिलसिला तो था ही, बाकी पाँच दिन हज का उत्सव होता था, जिसमें लोगों का उत्साह चरम पर होता और धन की भरमार मक्का के व्यापारियों के सामने आ जाती। संक्षेप में, मक्का अरब का एकमात्र तीर्थस्थल और पर्यटन केंद्र बन गया था। इसलिए वहाँ रहने वाले क़बीले, विशेषकर कुरैश, अत्यंत समृद्ध हो गए थे।


🪉 स्पष्ट है कि जब पैग़म्बर (सल्ल.) ने 360 मूर्तियों को अस्वीकार कर एक ईश्वर की उपासना का संदेश दिया, तो उन क़बीलों को अपनी आर्थिक व्यवस्था के नष्ट होने का भय दिखाई देने लगा। इसी कारण उन्होंने पैग़म्बर मुहम्मद (सल्ल.) के संदेश को अस्वीकार कर दिया और पूरी शक्ति से उनका विरोध शुरू कर दिया।


🪉 लेकिन उसी शहर में स्थापित वर्गों के अत्याचार से पीड़ित गरीब लोगों को पैग़म्बर (सल्ल.) का संदेश बहुत पसंद आया और उन्होंने उसे प्रेमपूर्वक स्वीकार किया। जब मुट्ठीभर शोषित लोगों ने पैग़म्बर (सल्ल.) का साथ देना शुरू किया, तो स्थापित वर्गों ने उन्हें अत्यधिक यातनाएँ देना शुरू कर दीं। अत्याचार इतना बढ़ गया कि उनके लिए मक्का में रहना कठिन हो गया।


🪉 तब पैग़म्बर (सल्ल.) ने अपने कुछ साथियों को पड़ोसी देश हबशा (इथियोपिया) की ओर हिजरत (प्रवास) करने का आदेश दिया। लगातार 13 वर्षों तक प्रयास करने के बावजूद मक्का के स्थापित लोगों ने इस्लाम स्वीकार नहीं किया।


▪️ इसके विपरीत मक्का के आसपास के क्षेत्रों में इस्लाम स्वीकार करने वालों की संख्या लगातार बढ़ती गई। विशेषकर मक्का के निकट स्थित मदीना शहर के लोगों को पैग़म्बर का संदेश बहुत प्रभावित करने लगा। मक्का की तुलना में मदीना में इस्लाम स्वीकार करने वालों की संख्या अधिक बढ़ने लगी।


🪉 मदीना से लोगों के समूह आते, पैग़म्बर (सल्ल.) से मिलते और उनके हाथ पर बैअत (निष्ठा की शपथ) लेते। इसे बैअत-ए-अक़बा कहा जाता है। कुल मिलाकर तीन बार बैअत-ए-अक़बा हुई। तीसरी बैअत पैग़म्बरी के बारहवें वर्ष हुई।


🪉उस समय मदीना के 75 सम्मानित व्यक्तियों का एक प्रतिनिधिमंडल हज के लिए मक्का आया था। हज पूरा होने के बाद एक रात उन्होंने पैग़म्बर (सल्ल.) से मुलाकात की, उनके हाथ पर बैअत की और उन्हें मदीना आने का निमंत्रण दिया तथा हर प्रकार से साथ देने की शपथ ली। और इसके कुछ ही समय बाद अल्लाह के आदेश से पैग़म्बर (सल्ल.) ने मदीना की ओर हिजरत की।


(इसके बाद मदीना में नए सामाजिक-राजनीतिक वातावरण का निर्माण हुआ, जिसे इतिहास में मदीना का संविधान / मदीना संधि कहा जाता है.)


                              #प्रत्यक्ष_युद्ध


🔖 इस बीच अल्लाह ने पैग़म्बर (सल्ल.) को सूचना दी कि दो में से किसी एक से मुकाबला होगा तो उनकी मदद की जाएगी। पैग़म्बर (सल्ल.) ने मदीना के सरदारों की सभा बुलाई और स्थिति स्पष्ट की। कुछ लोगों की राय थी कि व्यापारिक काफ़िले को लूट लिया जाए क्योंकि उसके साथ कम सैनिक थे और संपत्ति अधिक थी।


🪉 लेकिन पैग़म्बर (सल्ल.) ने मक्का से आने वाली सेना से मुकाबला करने का निर्णय लिया। क्योंकि जब तक मक्का वालों को निर्णायक रूप से पराजित नहीं किया जाएगा, तब तक उनका घमंड समाप्त नहीं होगा।


🪉 इस प्रकार अपर्याप्त तैयारी के बावजूद अल्लाह पर भरोसा करते हुए उन्होंने युद्ध का निर्णय लिया। उस समय लगभग 313 मुसलमान उपलब्ध थे। उनमें केवल 2-3 लोगों के पास घोड़े थे, 70 लोगों के पास ऊँट थे, हथियार भी पर्याप्त नहीं थे और केवल 60 लोगों के पास कवच था।


🪉 फिर भी इन 313 लोगों ने पैग़म्बर (सल्ल.) पर पूर्ण विश्वास रखते हुए 1000 सैनिकों वाली कुरैश की सेना से युद्ध करने की तैयारी कर ली।


🔖 इन 313 लोगों को लेकर 17 रमज़ान 2 हिजरी (13 मार्च 624) को पैग़म्बर (सल्ल.) ने मक्का की ओर प्रस्थान किया। दुश्मन को मदीना से लगभग 200 किलोमीटर दूर बदर के स्थान पर रोकने की योजना थी।


🪉 बदर के पास एक ऊँची पहाड़ी पर मुस्लिम सेना ने डेरा डाला। उसी समय वर्षा होने लगी। ऊपर की ज़मीन सख़्त हो गई और नीचे की ओर कीचड़ हो गया। मुसलमानों ने मेहनत करके पानी जमा करने के लिए अस्थायी हौज़ बनाया।


🪉 दूसरी ओर कुरैश की सेना पहाड़ी के नीचे आ पहुँची। पैग़म्बर (सल्ल.) ने युद्ध से पहले अल्लाह से दुआ की और फिर युद्ध शुरू हुआ।


🪉 इन 313 मुसलमानों ने परिस्थिति का लाभ उठाते हुए 1000 की सेना वाली कुरैश को पराजित कर दिया। इस युद्ध में मुसलमानों के 14 योद्धा शहीद हुए जबकि कुरैश के 70 लोग मारे गए।


▪️ मुसलमानों ने कई कुरैशियों को बंदी बनाया। बाद में हज़रत अबू बकर (रज़ि.) की सलाह पर पैग़म्बर (सल्ल.) ने उनसे कुछ धन लेकर कैदियों को रिहा कर दिया।


🪉 बदर का युद्ध क़यामत तक मुसलमानों के लिए प्रेरणादायक रहेगा। आज भी कई मुसलमान युवाओं की मोटरसाइकिलों पर 313 का अंक लिखा हुआ देखा जाता है। कई कवियों और शायरों ने भी इन 313 सैनिकों की वीरता का गुणगान किया है।


                    :इस युद्ध के दो बड़े परिणाम हुए:


1. मुसलमानों का आत्मविश्वास बढ़ गया।


2. केवल कुरैश ही नहीं बल्कि पूरे अरब में मुसलमानों की शक्ति का प्रभाव बैठ गया।


🪉 बदर के युद्ध ने यह सिद्ध कर दिया कि युद्ध केवल साधनों और संख्या से नहीं, बल्कि साहस, दृढ़ता और अल्लाह पर विश्वास से जीता जाता है।


🪉 आज शक्तिशाली इज़राइल के सामने हमास जैसा छोटा संगठन भी बदर की प्रेरणा से डटकर लड़ रहा है। समय के साथ इज़राइल को भी भारी नुकसान हो रहा है। अब तो फुल फ्लेज्ड वाॅर चल रहा है संभावना यही है कि इस युद्ध के बाद, इंशाअल्लाह, टू स्टेट्स सोल्यूशन निकलेगा फ़िलिस्तीन को स्वतंत्रता प्राप्त होगी। फलस्तीन और इजरायल दो देश बनेंगे।

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