*झुग्गी से शिखर तक : प्यारे खान का सफर और नई उम्मीदों की सियासत*
बशीर शेख ''कलमवाला''
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*“ख़ुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले,*
*ख़ुदा बंदे से ख़ुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है।”*
डॉ. अल्लामा इक़बाल का यह शेर उन शख्सियतों पर सटीक बैठता है, जिन्होंने हालात के आगे घुटने टेकने के बजाय अपनी मेहनत, हिम्मत और इरादों से तक़दीर को मोड़ दिया। महाराष्ट्र की सरज़मीं पर ऐसा ही एक नाम है — प्यारे खान।
आज, 4 मई को उनके जन्मदिन के अवसर पर दिल से दुआ निकलती है कि अल्लाह उन्हें सेहत, तंदुरुस्ती, इस्तेकामत और खिदमत-ए-खल्क़ की तौफ़ीक़ अता फरमाए, और उन्हें समाज की भलाई के लिए और भी बुलंद मुकाम बख्शे।
प्यारे खान केवल एक नाम नहीं, बल्कि संघर्ष, सफलता और सामाजिक जिम्मेदारी की जीवंत मिसाल हैं। नागपुर की एक साधारण बस्ती से निकलकर महाराष्ट्र राज्य अल्पसंख्यांक आयोग के अध्यक्ष पद तक पहुंचने वाला उनका सफर किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं—लेकिन यह कहानी पर्दे की नहीं, बल्कि हकीकत की है।
आज जब राजनीति में वंशवाद, सियासी विरासत और धनबल का दबदबा दिखाई देता है, ऐसे दौर में प्यारे खान जैसे लोग यह भरोसा दिलाते हैं कि मेहनत, लगन और जनता से जुड़ाव के बल पर भी नेतृत्व हासिल किया जा सकता है।
संघर्षों में ढला हुआ व्यक्तित्व
प्यारे खान का जन्म नागपुर के एक आर्थिक रूप से कमजोर परिवार में हुआ। बचपन अभावों में गुज़रा, मगर हौसले कभी कम नहीं हुए। कम उम्र में ही जिम्मेदारियों का बोझ कंधों पर आ गया।
रेलवे स्टेशन पर संतरे बेचना, छोटे-मोटे काम करना, मजदूरी करना — यह सब उनके जीवन का हिस्सा रहा। पढ़ाई के रास्ते में भी कठिनाइयाँ आईं, असफलताएँ भी मिलीं, लेकिन उन्होंने हार मानना नहीं सीखा।
यही संघर्ष उनके व्यक्तित्व की असली नींव बना। गरीबी ने उन्हें रोका नहीं, बल्कि तराशा।
ऑटो रिक्शा से कारोबार तक
जवानी में उन्होंने ऑटो रिक्शा चलाकर जीवन की गाड़ी आगे बढ़ाई। दिन-रात की मेहनत से जो कमाई होती, उसी से घर चलता और सपने भी पलते।
धीरे-धीरे उन्होंने परिवहन क्षेत्र में अवसर पहचाना और ट्रांसपोर्ट व्यवसाय की ओर कदम बढ़ाया। शुरुआत कठिन थी — न संसाधन, न भरोसा, न पूंजी। लेकिन हौसला था।
एक सेकंड हैंड वाहन से शुरू हुआ सफर धीरे-धीरे ट्रकों के बड़े नेटवर्क तक पहुंचा। कारोबार महाराष्ट्र से बाहर फैलता गया और आगे अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचने लगा।
यह सफर इस बात की गवाही देता है कि मंज़िल उन्हीं को मिलती है, जिनके इरादों में जान होती है।
“ऑक्सीजन मैन” — इंसानियत की पहचान
कोरोना महामारी के दौरान जब देश संकट में था और ऑक्सीजन की भारी कमी थी, तब प्यारे खान ने जो किया, वही उन्हें भीड़ से अलग करता है।
उन्होंने केवल बातें नहीं कीं, बल्कि मैदान में उतरकर काम किया। लाखों रुपये खर्च कर ऑक्सीजन सिलेंडर, कॉन्सेंट्रेटर और सप्लाई व्यवस्था खड़ी करने में मदद की।
हजारों लोगों के लिए वे उस दौर में उम्मीद की सांस बने। इसी वजह से लोगों ने उन्हें “ऑक्सीजन मैन” का नाम दिया — और यह सम्मान जनता ने दिया।
राजनीति में नई पहचान
सामाजिक कार्यों के चलते उन्हें राजनीति में एक अलग पहचान मिली। आज वे महाराष्ट्र राज्य अल्पसंख्यांक आयोग के अध्यक्ष हैं।
इस पद पर रहते हुए उन्होंने खुद को केवल औपचारिक भूमिका तक सीमित नहीं रखा, बल्कि शिक्षा, पारदर्शिता, योजनाओं के सही क्रियान्वयन और भ्रष्टाचार के खिलाफ सक्रिय भूमिका निभाई।
फर्जी अल्पसंख्यक संस्थाओं पर कार्रवाई का रुख अपनाकर उन्होंने यह स्पष्ट किया कि समाज के नाम पर गलत काम स्वीकार नहीं किए जाएंगे।
भाजपा में एक अलग चेहरा
भाजपा में रहते हुए भी प्यारे खान ने अपनी एक अलग पहचान बनाई है। वे टकराव की राजनीति के बजाय विकास, संविधान, शिक्षा और रोजगार की बात करते हैं।
वे उन नेताओं में हैं जो ज़मीन से जुड़े हैं, जिन्होंने संघर्ष देखा है और समाज की नब्ज समझते हैं। यही वजह है कि वे पार्टी के भीतर एक संतुलित और सकारात्मक चेहरा बन सकते हैं।
मुस्लिम राजनीति में नई दिशा
महाराष्ट्र में मुस्लिम राजनीति लंबे समय तक सीमित मुद्दों तक सिमटी रही। लेकिन प्यारे खान उस सोच को बदलने की क्षमता रखते हैं।
वे युवाओं को शिक्षा, उद्यमिता, स्किल डेवलपमेंट और सरकारी योजनाओं से जोड़ने की बात करते हैं। उनका दृष्टिकोण “शिकायत” से आगे बढ़कर “भागीदारी” की ओर है।
यही सोच उन्हें भविष्य का नेता बनाती है।
जनता का भरोसा
प्यारे खान को लोग इसलिए पसंद करते हैं क्योंकि वे:
संघर्ष से निकले हैं
खुद अपना मुकाम बनाया है
संकट में लोगों के साथ खड़े रहे
सीधी और साफ भाषा बोलते हैं
सिस्टम को समझते हैं
समाज के बीच रहते हैं
आज जनता अनुभव और ईमानदारी को महत्व देती है — और यही उनकी ताकत है।
चुनौतियाँ और आगे का सफर
हर उभरते नेता की तरह उनके सामने भी कई चुनौतियाँ हैं —
समाज का भरोसा बनाए रखना, पार्टी में संतुलन साधना और विकास की राजनीति को ज़मीन पर उतारना।
लेकिन उनका अब तक का सफर बताता है कि वे कठिन रास्तों से गुजरना जानते हैं।
“सितारों से आगे जहाँ और भी हैं,
अभी इश्क़ के इम्तिहाँ और भी हैं।”
प्यारे खान का सफर अभी खत्म नहीं हुआ — बल्कि असली सफर अब शुरू हुआ है।
महाराष्ट्र की राजनीति, अल्पसंख्यक समाज और नई पीढ़ी उनसे उम्मीदें लगाए बैठी है।
और शायद उनकी सबसे बड़ी पहचान यही है —
एक ऐसा शख्स, जिसने हालात से लड़कर खुद को बनाया,
और फिर समाज को बनाने की राह चुन ली।

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