25 जून यौमे पैदाइश
देश के महान स्वतंत्रता सेनानी एवं राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी के प्राण रक्षक---- #बतख_मियां_अंसारी
🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸
आप वह शखससीयत हैं जिन्होंने *गांधीजी को जहर देकर मारने की अंग्रेज़ नौकरशाहों की साज़िश को नाकाम किया था*।
🟩🟥🟧🟪🟩🟥🟧🟪🟩🟥
आपकी पैदाइश 25 जून 1867 में बिहार के चम्पारण ज़िले के मोतीहारी कुस्बे में हुई थी
आपके वालिद का नाम मोहम्मद अली अंसारी था। आप पढ़े-लिखे नहीं थे। आप ब्रिटिश हुकूमत में डाक-बंगले के मुलाज़िम थे।
चम्पारण के किसानों खासकर नील बगान में काम करनेवाले हिन्दुस्तानी किसानों, पर ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी के अफसरों के जूरिये होने वाले जुल्मों की शिकायत की जांच के लिए सन्
*1917 में महात्मा गांधी व डॉ. राजेन्द्र प्रसाद चम्पारण और डाक बंगले में रुके*। जांच में
शिकायतें सही पायी गयीं। अंग्रेज़ अफ़्सर डर गये और उन्होंने *महात्मा गांधी को खाने में*
*जहर देकर मारने की साज़िश की*। इसके लिए उन्होंने अंग्रेज़ कुक से खाने में जुहर मिलवाकर हिन्दुस्तानी आदमी से परोसने की प्लानिंग की। इसके लिए डाक बंगले के चोकीदार बतख मिया को भारी इनाम व इकराम देने की लालच दो, लेकिन जब वह तय्यार नहीं हुए तो अंग्रेज़ अफ़्सर ने उनकी बीवी-बच्चों को कैद कराके उन्हें मारने की धमकी दी और किसी तरह बताक् मियां अंसारी को मजबूर किया।
*बतख मिया ने उपर उपर हामी तो भर ली लेकिन जब खाना परोसा तो चुपके से डॉ. राजेन्द्र प्रसाद को हकीकत बता दी।जब राजेन्द्र बाबू ने गांधीजी को यह बात बतायी तो उस रात उन लोगों ने खाना नहीं खाया*। अगली सुबह जब उन्होंने बड़े अंग्रेज़ नौकरशाह से मिलकर उससे इस बाबत शिकायत की तब बताक मियां के बीवी-बच्चे रिहा कर दिये गये *लेकिन गांधीजी के जाने के बाद बतख मियां को नौकरी से निकाल दिया गया और चोरी के इल्ज़ाम में थाने पर लाकर बहुत जुल्म किया गया और उन्हें झूठे केस में जेल में डाल दिया गया*। कई सालों के बाद जब पैक्ट हुआ और हिन्दुस्तान की जेलौं में बन्द बहुत-से हिन्दुस्तानी छोड़े गये तब बतख मियां अंसारी भी रिहा होकर अपने घर आये।
मगर जेल में इतनी अजीयत
दी गयी कि वह बीमार रहने लगे।
*मुल्क आज़ाद होने के बाद पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र*
*प्रसाद जब सन् 1950 में* *चम्पारण के दौरे पर गये तो उन्होंने बथक मिया अन्सारी की खोज की और भरी सभा में बतख मियां अन्सारीने गांधीजी की किस प्रकार जान बचाये सारा किस्सा सूनाया* ।
और कहने लगे की,बतख मियां की कुर्बानी और उन पर अंग्रेजों के जुल्म की दस्तान को लफजो मे बयाण करना मुश्किल है ।
*उनकी कुर्बानी व मुल्कपरस्ती की तारीफ करते हुए उन्हें 35 बिघा ज़मीन एलाट किये जाने का हुक्म दिया*।
मगर अफ़ुसोस कि *सन् 1952 से सन् 1957 तक इंतज़ार करते-करते बतख मियां अंसारी दुनिया से रुखसत हो गये,लेकिन भारत के राष्ट्रपति का आदेश सरकारी फाइलों का चक्कर ही काटता रह गया*।
जब सन् *1958 में कांग्रेस की* *किसी मीटिंग में डॉ. राजेन्द्र* *प्रसाद को जब फिर इस बात के लिए याद कराया गया तो उन्होंने बतख मियां के घरवालों को 3 दिसम्बर सन् 1958 को राष्ट्रपति भवन में बुलाकर उनसे मुलाकात की और फौरन बतख मियां की कुर्बानियों का इनाम देने का अपना पुराना हुक्म तामील करने के लिए लिखा*।
*राष्ट्रपति के दो बार हुक्म दिये जाने के बाद भी बताक मियां अंसारी के घरवालों को सरकारी ज़मीन सन् 1999 तक नहीं मिल पायी*।
सन् 1999 मे मशहूर *फ्रीडम फाइटर सैय्यद इब्राहिम फिकरी (दिल्ली) ने उर्दू में एक किताब 'हिन्दुस्तानी जंगे-आज़ादी में मुसलमानों का हिस्सा' में जब इस वाक्ये को लिखा* और अख़बारों में छपा तब बाद में *राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने इस फाइल को तलब किया*।
लेकिन *उनकी तीसरी पीढ़ी को भी सरकारी सहूलियत अब तक नहीं मिल पायी है*।
----------------///---;;;;;;;;;;;;;-
टीप - *बतख मिया अन्सारी जी के पोते ने हिंदुस्थान टाइम्स को एक इंटरविव्ह मे बताया की राष्ट्पति राजेंद्र प्रसाद ने हमारे दादा जी को 35 बिघा जमीन मंजूर की लेकीन सिर्फ हमे ढाइ बिघा जमीन ही मिली है*
------------------///----------------
संदर्भ- 1)THE IMMORTALS
sayed naseer ahamed
2)Heritage Times
▪️▪️▪️▪️▪️▪️▪️▪️▪️
अनुवादक तथा संकलक लेखक
*अताउल्ला पठाण सर टूनकी बुलढाणा महाराष्ट्र*
9423338726

0 Comments